बंद मुट्ठी में दुबका अरमानो का पंछी
भरना चाहता है परवाज(उड़ान) अब खुले आसमान में.
२
नामुमकिन को मुमकिन
जो बना सकता है
मुझसे तू बस उसी जूनून की बात कर
३
में अदा हूँ वादे वफ़ा हूँ
में हया हूँ,मीठी सी सदा हूँ
४पत्थर भी पिघलते हैं इरादे गर पक्के हो
मंजिल चूमती है कदम गर वादे दिल ke सच्चे ho
good poem,my best wishes for it
ReplyDeletedr.bhoopendra
rewa mp
नामुमकिन को मुमकिन
ReplyDeleteजो बना सकता है
मुझसे तू बस उसी जूनून की बात कर
बहुत खूब!